बरखा – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

बरखाबादल के घूंँघट में बरखागरज गरज के बरसती है।धरा हमारी बूंद – बूंद कोकाहे को फिर तरसती है।।इसका कारण है पर्यावरणहम संभाल नहीं पाते हैं।कहीं काट देते पेड़ों कोप्रदूषण रोक नहीं पाते हैं।।कभी ये वरखा हमें रुलातीकभी तो खूब हंसाती है।कभी सुखाती खेतों को तोकभी हरियाली लाती है।।बादल गरजा बिजली चमकीवह अपना रंग दिखाती है।जल मग्न कर देती हैं नदियाँगली गली में फैलाती है।।पानी का सैलाब कहर बनहम सबों पर टूट पड़ता है।तांडव करता शोर मचाताइठलाकर आगे बढ़ता है।।जान – माल की हानी होतीसंकट में सब घिर आते है।गरीब बेचारा ऐसे मर जाताकुछ इक राहत भी पाते हैं।।संतुलन खोती धरा हमारीहम से अब वह कुछ बोल रही।छेड़ – छाड़ न करना अब तुमहिम्मत मेरी अब डोल रही।।कहे “बिन्दु” अब दूर नहीं हैऐसा संकट भी आयेगा।पानी – पानी हर जगह होगापानी में ही डुब जायेगा।।

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  1. C.M. Sharma 15/07/2019

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