कुंडलियाँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

दोहा – कुंडलियाँ1कुंडलियाँ लिखने चला, दोहा पहले जानशब्दों – शब्दों में कला, पहले इसको मान।पहले इसको मान, बड़ी लुभावनी है येरखें इतना ध्यान, अंतर् भावनी है ये।मन गदगद हो आज, खिल खिला जाए कलियाँतब करती है राज, हृदय सजती कुंडलियाँ।2नगरी भोले नाथ की, बैजनाथ है नामकेदार, विश्वनाथ जी, रहते अपने धाम।रहते अपने धाम, भक्तों का संकट हरतेकरते अपने काम, भक्त की झोली भरते।जाये उनके द्वार, भर के गंग जल गगरीतो रहता खुशहाल, अपना गाँव या नगरी।

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  1. C.M. Sharma 15/07/2019

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