काली रात आयी है – डी के निवातिया

काली रात आयी है

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डोली में सजकर, माँ के घर, ये कैसी सौगात आई है,तिरंगे में लिपटे देखो, बाँके दूल्हों की बारात आई है।

एक बार फिर से खेला है सियासत ने अपना दाँव,आज फिर से जाँबाज़ों की आबरू पर बात आई है।

गुनेहगारों के हाथो थमा दी, हमने सत्ता की लगाम,सियासत की दौड़ में लंगड़े घोड़ो की ज़मात आई है।

न ईमान-धर्म कोई, न ज्ञान का आधार बाकी है,लुभाने में आज सामने सभी की औकात आई है।

सफेदपोशी में लिपटी अमिट असीम काली करतूते,दिन के अंधेरो में दिखाने वो अपनी जात आई है ।

मिटाई जा रही सच की निशानियाँ झूठ के पर्दो से,बेबस अश्कों से घिरी ये कैसी काली रात आई है।

भूल नहीं सकता, भूलकर भी, जख़्म इतने गहरे है,किसे दिखाए “धर्म” सीने जो गहरी आघात आई है ।!स्वरचित:- डी के निवातिया

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6 Comments

  1. C.M. Sharma 03/07/2019
    • डी. के. निवातिया 03/07/2019
      • C.M. Sharma 03/07/2019
        • डी. के. निवातिया 04/07/2019
  2. Bhawana Kumari 03/07/2019
    • डी. के. निवातिया 04/07/2019

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