ग़ज़ल – तू जो मुझ में समायी तू ही रह गयी….

मौत कब है बँटी ज़िन्दगी रह गयी….हर किसी में अना की अमी रह गयी…धूप में छाँव के आँचल की तरह…मेरी साँसों में खुशबू तेरी रह गयी….मिट गया हर निशाँ-ओ-वजूद इस तरह…तू जो मुझ में समायी तू ही रह गयी….फासलों ने उजाड़े हैं घर इस तरह…अब मकाँ रेत पत्थर ज़मी रह गयी…सांस चलती रही मैं पिघलती रही…धौंकनी याद से मैं जली रह गयी….घूम आओ सभी धाम बेशक जहां…माँ न पूजी तो पूजा धरी रह गयी…दूरियाँ दरमियाँ यूं बसी हैं ‘चन्दर’…ज़िन्दगी ज़ह्र की इक नदी रह गयी…अमी = मीठा लगना, अमृत जैसा\/सी.एम्.शर्मा (बब्बू)

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6 Comments

  1. डी. के. निवातिया 02/07/2019
    • C.M. Sharma 03/07/2019
  2. Shishir "Madhukar" 03/07/2019
    • C.M. Sharma 04/07/2019
  3. Bhawana Kumari 03/07/2019
    • C.M. Sharma 04/07/2019

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