छंद _बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

छंदनूपुर छंद का राग छेड़ता, जब कानों में आता हैपायल की आवाज प्रणयन कर, मन को ही छू जाता है।कंगन – चूड़ी गीत बन जाते, श्रुति की बाली गाती हैपाँव की बिछिया हँस – हँस बोले, बिंदिया साज सजाती है।करता है अनुमोदन शहद सा, विहग स्वप्न भर लाता हैउनके श्रृंगार मन भावों का, उत्कृष्ट खेल दिखाता है।आप ग़ज़ल की प्राण हो प्यारी, कविता ये बतलाती हैहर अदा ही मनमोहक लगती, रुनक – झुनक मदमाती है।नखरे तेरे नाज नयनों का, अधरों को छू जाता हैतुम हंसती हो जब – जब गोरी, रस – पराग झड़ जाता है।नागन जैसी चाल जब चलती, मौसम रंग बदलता हैइन्द्रधनुषी रंगों में तेरा ,चाँद चकोर निरखता है ।कवि – शायर, तुम ग़ज़ल की रानी, “बिन्दु” यही बतलाता हैयुग – युगों से ये चलता आया, सबको यही लुभाता है।

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2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 01/07/2019
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 01/07/2019

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