रेल की पटरी

मेरे घर के पिछवाड़े से, कुछ दूरी पर,इक रेल की पटरी दिखती है,अनगिनत पहलुओं पर वो पटरी,इस दुनिया से मिलती-जुलती है..न कोई ओर, न कोई छोर,बस चली जा रही है मीलों,अपने असीम अस्तित्व को लिएकहीं सीधी तो कहीं टेढ़ी,कभी सहसा एक नया मोड़ लेती है,और खट्टे-मीठे तजुर्बों से,हमें जोड़ देती है…कहीं कोई लेखा-जोखा नहीं है,कितने मुसाफिर इस राह से गुजरे है,कब, कहाँ, किसका सफर शुरू हुआ,और कितने पहुंचे मंज़िल तक…हमारा ये भ्रम और अहंकार कि”ये है हमारी मुट्ठी में, हम इसे चलाते हैं”होता है विध्वंस क्षण भर में,जब इंजन की सीटी देती है आवाज़,कराती है अपनी प्रबलता का एहसास…

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4 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 27/06/2019
    • Garima Mishra Garima Mishra 28/06/2019
  2. Abhishek Rajhans 29/06/2019
    • Garima Mishra Garima Mishra 09/07/2019

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