ढ़ूढता हूँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

ढूंढता हूँ तारों के बीच का एक छोटा सा टुकड़ा…ढूंढता हूँ समुद्र और झील के गहराइयों में छुपे रत्न..मुट्ठी में बंद कर लेना चाहता हूँ जलते हुए सूरज का धूप…नज़रों से आसमान को उठाकर ला देना चाहता हूँ जमीं पर….पूरा ब्रह्मांड ही लाकर रख देना चाहता हूँ तेरे कदमों में…तीन लोक और चौदह भुवन चाहूँ तो गिरवी रख दूँ तेरे पास ..चाँद – तारों को कौन पूछता, सूरज को उंगली पर नचा सकता हूँ …सारी बातें कोरी कल्पना और मन की फिजूल बातों से कम नहीं ..वास्तविक में ऐसा कुछ भी कभी भी संभव नहीं होता…फिर भी लोग तील का ताड़ खाली बैठकर कलम घीसते हैं…अन्न देने वाला किसान अगर ये सोचे तो लोग भूखे मारे जायेंगे…साहित्यकार अगर लेखनी में ताकत नहीं लाये तो सबका बंटाधार…वाह रे समाज, संसार के कुरीतियों को कौन समझेगा…हमारे भुगोल का असली जिम्मेदार वो अवतारी कौन होगा…सब एक – दूसरे का पैर खींचने और पैसा बटोरने में लगे हैं …धर्म जाति और मजहब के बीच सिमट कर रह गये हैं लोग…रिश्ता तार – तार होते देखकर खामोस रहते हैं सब…कचरे में गरीबी और महलों में ऐस करते लोग…मात्र तीस हजार रुपये कमाने वाले के घर तीन सौ करोड़ की संपत्ति…

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  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 25/06/2019

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