कबीर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

महिमामंडित कबीरविद्या – दोहाशत पंद्रह की बात है, काशी उनका धामघर में पले जुलाह के , कपड़े बुनना काम।लोढ़ा – पत्थर प्यार का, खूब जमाया रंगजो वाणी वो बोल गये, सभी रह गये दंग।जाति – मजहब धर्म नहीं, कर्म – मर्म है योगविधना ऐसा लिख गया, ये सब था संयोग।अक्षर ज्ञान कुछ था नहीं, फिर भी बने महानबड़े – बड़े ज्ञानी करे , इनका ही गुणगान।साधक संत कबीर की, वाणी है अनमोलअगर अमल वाणी करें , हो जीवन की मोल ।आत्म मंथन ज्ञान है, मन मंथन है ध्यानऐसे भगत कबीर थे, हम सब के बरदान।कबिरा खड़ा जहाँ हुआ, वहीं जम गये लोगवाणी सुन गदगद हुए, भागे मन के रोग ।स्वरचित – कवि – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दुबाढ़ – पटना

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  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 25/06/2019
  2. Dr.M.C. Gupta 07/07/2019

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