हाहाकार – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

हाहाकारबूंद – बूंद को तरसोगे तुमपानी – पानी  को तड़पेगा ।जब जंगल ही काट रहे तोये चमन कहाँ से महकेगा ।।रहने दिये न रेत नदी मैंबुरा हाल है इस सदी में ।भूधर को तोड़ा है तुमनेगंदगी डाल दिये बदी में ।।पर्यावरण, तुम राग अलापोदिनों – रात पैसे को छापो ।दौलत खाना, पैसा पीनाकितनी गरमी ये तो भापो ।।मौसम का मिजाज है बदलापूरी दुनिया इससे दहला ।सलिल सतह से इतना भागाक्यों ईमान न अपना जागा ।।कब तक ऐसे काम चलेगाइंसा को इंसान छलेगा ।माया – ममता रोना हँसनाऐसे संकट नहीं टलेगा ।।कइ सम्मेलन उठक- बैठकीबात करे सब अपने मन की ।सरकार की ये जिम्मेदारीचिंता करो अपने वतन की ।।अब तो ले लो जिम्मेदारीनिभाओ अपनी व्यभिचारी।पढ़ – लिखकर बेकार बन गयेकाम तो करो कुछ उपकारी। ।

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