ग़ज़ल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

ग़ज़लअफसाना मुहब्बत का, तराना लिख रहा हूँतेरे नाम का मैं आशियाना लिख रहा हूँ।तुम दिलरुवा हो मेरी, महबूबा मेरी तुमअपने जिगर पर मैं, आशिकाना लिख रहा हूँ।ना मुझसे दूर होना, न जाना दिल से दूरतेरे इन नज़रों का, शरमाना लिख रहा हूँ।दिवानों से न पूछो, मेरे इस दिल की हालमैं पागल दिवाना हूँ, परवाना लिख रहा हूँ।हम दोनों कसमें खाएँ, मरने – जीने को साथअपने इन लफ्ज़ों में, दोस्ताना लिख रहा हूँ।तुम जानाँ मेरी जानो, तेरा आशिक हूँ मैंदिवानगी है ऐसी, दिवाना लिख रहा हूँ।तुम आशना हो मेरी, मैं “बिन्दु” तेरा प्राणगुलिस्तों में ही तुमको, महकाना लिख रहा हूँ।

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  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 25/06/2019

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