आखिर क्यों तुम…

जब भी मैं होता हूँ तुम्हारे आस-पासक्या तुम्हें कुछ भी नहीं होता हैक्या तुम्हारे भीतर वो सुगबुगाहट नहीं होतीक्या तुम्हारी आँखे मुझे तलाशने की कोशिश नहीं करतीक्या तुम्हें मेरी खुशबू मेरे जाने के बाद महसूस नहीं होतीमुझे तुमसे कुछ ज्यादा नहीं चाहिएसिर्फ तुम्हारे होने का एहसास मेरे अंदर भी जिंदा रहेबस इस बात की ही तो तस्दीक चाहिएकिसने कह दिया तुम्हे कीमैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊँगाअरे! पगली तुम्हारी यादों के संगमैं सुकून से तो मर पाऊंगाइतना हक भी नहीं दोगी तुम मुझेतुम मेरे पास हमेशा रहोगीरूहे भी कहीं जुदा-जुदा सी रहती है तुम मेरे हरेक दर्द में मरहम की तरह होशायद इसलिए तो मैं महफूज हूँमुझे ज़िंदा रहना है क्योंकि मुझे तुम्हे हमेशा मेरे भीतर समेट कर रखना हैआखिर कैसी झिझक है तुम्हारीऔर क्या है तुम्हे परेशानीक्या सच में मेरा पास होनातुम पर कोई असर नहीं करतातुम्हे बेख्याली में भी मेरा ख्याल नहीं रहतामेरी हर एक बात, हर्फ और लफ्ज़सब याद रहते हैं तुम्हेफिर क्यों तुम जुबां से कुछ कहना ही नहीं चाहतीआखिर क्यों तुम मुझेकबूल करना ही नहीं चाहती–अभिषेक राजहंस

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