मैं तुम्हारे बिना….

मैं तुम्हारे बिना…अब धीरे-धीरे मरने लगा हूँजो ब लगा के गयी तुम आगउसी आग में जलने लगा हूँकैसे कहूँ और किससे कहूँतुम्हारे दिए दर्द को कागज पर उतार करमैं खुद को अब शायर समझने लगा हूँतुम्हारे बिना..अब रहता मुझको होश कहाँमैं कहूँ तो किससे कहूँअब किसी को समझ आता नहीं हूँनींद कहा आती है अब मुझेऔर ना ही मैं जग ही पाता हूँराख ही बन जाता हूँ रोज रोजऔर फिर तेरी यादों को याद करधीरे-धीरे सुलग जाता हूँमैं तुम्हारे बिना…अब संभल ही नही पाता हूँअंधेरा अच्छा लगने लगा है मुझेशायद इसलिए कमरे सेरौशनी गायब करने लगा हूँसिसकियां दफ़न हो जाए भीतर ही इसलिए खुद को चहारदीवारी में बंद रखने लगा हूँएक बार मैं मर जाता तो क्या बात होतीतुम्हारे दिए दर्द में रोज हीतिल-तिल कर मरने लगा हूँ -अभिषेक राजहंस

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