रचनाएँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

गरीब बापउनके जीवन में कहाँ, कब कोई सबेरा थाजिंदगी गुजारा संघर्ष में, जहाँ अंधेरा था।पते की बात ही करते रहे हमसफर बनकरगलती बस इतने कि गरीबी ने उन्हें धेरा था।उम्र से पहले शादी, दो बेटे, चार बेटियाँउनके सादगी से जीवन में बड़ा बखेरा था।प्राइवेट नौकरी – कम वेतन – पढ़ाई – लिखाईहर पल हर जगह ही समस्याओं का ढेरा था।न छल – कपट,न बेईमानी,आदमी इंसान थाकर्ज में डूबा, उनको महाजनों ने पेरा था।बेटियाँ जैसे – तैसे, ससुराल को चली गईंबेटा भी अवारा , जैसे कोई सपेरा था।फर्ज रिश्तों का निभाया अपना घर चलायाथक हार कर बैठा, अब बुढ़ापे का फेरा था। लागे ना मनवां हमारसजनवां हम से ना बोले।हमसे ना बोले हो, हमसे ना बोलेतड़पेला मनवां हमारसजनवां हम से ना बोले।।पुरनका जमाना केभूल हम गइनी ।गलती का कइनी किमाई घरे गइनी।माई घरे गइनी हो, माई घरे गइनीछूटल बा संगवा हमारसजनवां हम से ना बोले।।आपन सजन केमनाईं हम कैसे।कैसे बताईं हमसमझाईं कैसै।समझाईं कैसै हो, समझाईं कैसैसुन लागे अंगना हमारसजनवां हम से ना बोले।।रूठल कबलेरहबऽ ए राजा ।माफ करऽ गलतीबहिंयाँ में आ जा।बहिंयाँ में जा हो, बहिंयाँ में आ जाबोलेला कंगना हमारसजनवां हम से ना बोले ।। मंदिरों में पंड़ो का राजठग – लुटेरों का अंदाज।देवों का दर्शन में फीस हैपंड़ा बनते चार सौ बीस हैं ।।चरम पर ऐसा व्यापार हैभक्त – भगवान लाचार है।भक्तजनों की उमड़ती है भीड़अव्यवस्था बन जाती है पीड़।सहन करता सिर्फ गरीब हैपैसौं वालों का क्या नसीब है।।हर मोड़ ऐसे यह लचार हैजहाँ देखिये लम्बी कतार है।पैसों पर बन जाती कतारेंकुछ कर नहीं पाती सरकारें।आम आदमी रहता है तंगना जाने कब बदलेगी ढंग।।फरेबों का अलग बाजार हैइनमें ही हो जाता दिदार है।लाखों – करोड़ों के चढ़ावाहजम कर जाते हैं ये बाबा।आस्था – विश्वास का हननधर्म नाम पर हो रहा पतन।।यह उन पंड़ो का रोजगार हैदेश आज इसलिए बिमार है।

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2 Comments

  1. C.M. Sharma 17/06/2019
  2. डी. के. निवातिया 19/06/2019

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