ग़ज़ल-अश्क अंगार मेरे मुझ से गिराये न बने…

जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब साहिब की एक ग़ज़ल है….”नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने… क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने”…. इसी ज़मीन में लिखी ग़ज़ल…

कुछ कहूँ खुद से न कुछ तुमको सुनाये न बने…
सांस मेरी को तेरी याद भुलाये न बने…

एक उम्मीद घटा से थी बरस जाए इधर…
वो गिरी और कहीं दिल को मनाये न बने…

शाम के बाद सहर हो गयी दिल सूना है…
चाँद सूरज में तेरा साथ बनाये न बने…

देख कर तुझको मैं तुझ सा ही हुआ जाता हूँ…
या खुदा खुद को कहीं और छुपाये न बने…

एक दीवार उठी हम से गिरायी न गयी…
अब ये आलम है कि खुद को ही उठाये न बने…

ज़िन्दगी कर गई वादा जो मुझे मिलने का…
मौत आने पे भी फिर जान को जाये न बने…

इश्क़ ईनाम कफ़न उनसे मिला था ‘चन्दर’…
अश्क अंगार मेरे मुझ से गिराये न बने…

II सी.एम्.शर्मा (बब्बू) II

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/06/2019
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 25/06/2019
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 19/06/2019
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 25/06/2019

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