वो साँवली सी लड़की

वो सांवली सी लड़कीअपनी ललाट के बीचो बीचएक छोटी सी काली बिंदी लगाती हैआँखों मे अजीब सी चमक लिएरोज मेरे घर के सामने की सड़क से गुजर जाती हैपता नहीं आखिर क्यों वो मुझे देख कर अपने खुले केशो कोजोर से झटका जाती हैकभी कभी तो अपने साईकिल की घन्टीजोर -जोर से बजा करमेरे शांत मन मे जलजला ही ला देती हैआखिर क्यों वो मुझेकभी देख कर अनदेखा तोकभी देख कर मुस्कुरा देती हैये सिलसिला उसका अब रोज-रोज का हो चला हैक्या वो पागल तो नहीं हैया मुझे पागल करने चली हैअजीब सा कुछ उसने कर दिया हैउसके जाने और आने का अलार्म मैंनेआखिर क्यों अपने मोबाइल में लगा लिया हैउसका मुझे देख कर मुस्कुराना अब मुझसे मेरी नींद चुरा रहा हैउसका रोज-रोज मिलना मुझे अबजरूरी सा लगने लगा हैउसकी चमकती नाक की बूंदी मेंजाने क्यों ये मन खोने लगा हैउसके एक भी दिन न गुजरने परदिल मेरा कुछ बेचैन सा रहने लगा हैपता नही क्या कर दिया हैउस साँवली सी लड़की ने—-अभिषेक राजहंस

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