परछाई -Bhawana Kumari

बनकर मेरी ही परछाई तुम मेरे साथ चलती हो,जब चलती हूँ सुनसान रास्तों पर तुम मेरे साथ होती हो ।मेरे जैसी ही हंसती हो मेरे जैसे ही रोती हो,जैस जैस मैं करती हूँ तुम मेरी हुबहू नकल करती हो ।कभी मेरे आगे चलती हो कभी मेरे पीछे चलती हो,कभी मुझसे छोटी तो कभी मुझसे बड़ी दिखती हो ।बनकर मेरी ही परछाई तुम मेरे साथ चलती हो ।पर जब भी गुजरती हूँ अंधेरों से तो मेरा साथ छोड़ देती हो,फ़िर उजाला पाकर मेरे साथ हो लेती हो ।क्या तुम भी मेरे जैसे ही अंधेरे से डरती हो,जब मैं चलती हूँ तब तुम भी चलती हो।जब मैं रुकती हूँ तब तुम भी रुकती हो ना जाने कब से तुम मेरे साथ चलती हो ।जब सब छोड़कर मुझको चले जाते हैं,तब तुम कहती हो तुम मेरे साथ रहती हो ।पर तुम भी औरों के जैसी ही झूठी हो,क्योंकि अँधेरा पा कर तुम भी साथ छोड़ देती हो ।भावना कुमारी

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