उलझनें – शिशिर मधुकर

मुहब्बत से किया जीता मुझे ही अब सताते हो जब भी आवाज दी कोई बड़ी मुश्किल जताते हो कभी छोड़ा नहीं तनहा दौर एक वो भी था अपना मिलन है अब नहीं मुमकिन फकत इतना बताते हो दिलाते हैं याद कसमें और तुझको तेरे वादे कोई उत्तर ना दे बातें हंसी में तुम उड़ाते हो कद्र कुछ तो करो खुद के लिए मेरी मुहब्बत की क्या तुम भी प्यार में इंसान को इतना मनाते हो उलझनें ये नहीं अच्छी खुले मन से जरा सोचो मुहब्बत पाक मधुकर की खुद ही से क्यों गंवाते हो शिशिर मधुकर

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