नीति

इस कालखण्ड की बात नहीं ये हर कालगर्भ में बीती हैशेष नहीं रहता कपटी कोईसब देश धर्म की नीति है जो अंगारों पर ले ध्वजआकंठ हलाहल पीते हैं केवल वे ही हर युग में अपना जीवन जीते हैं मैं कष्टों को कष्ट कहुँ ये मेरी लाचारी हैतुम शोलों को पुष्प कहोफिर वसुंधरा तुम्हारी है अश्वमेघ बढने वालों के देखोसरपट दौड़े जाते हैं कंटक,काफिर,कुकर्मी सदा हीपथ पर छोड़ें जाते हैंकाष्ठ, ताम्र,शिलालेख में सदा वीर सजाऐ जाते हैं और अधम के रक्त से सर्वदा अभिषेक कराये जाते हैं

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2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 27/05/2019
  2. Rakesh Kumar 12/08/2019

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