अंदरूनी – शिशिर मधुकर

सुकूं ना मुझको मिला रात सूनी सी रही बुझी ना आग कभी जलती धूनी सी रही सफर में साथ चले फूलोँ की आस करी राह हर एक मगर बड़ी खूनी सी रही चोट दिल पे जो लगी खून बाहर ना बहा पीर घावों की मगर देख दूनी सी रही ठंड मिल जाती अगर थोड़ी ताप सह लेते सिफत कफन की भी पर यहाँ ऊनी सी रही निखर गया है कोई साथ इक हसीं पा कर हंसते मधुकर की पीर देखो अंदरूनी सी रही शिशिर मधुकर

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4 Comments

  1. C.M. Sharma 22/05/2019
    • Shishir "Madhukar" 22/05/2019
  2. डी. के. निवातिया 22/05/2019
    • Shishir "Madhukar" 22/05/2019

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