अनजान – शिशिर मधुकर

मैंने सजाया था तुम्हें अपने मुकुट में मान सा लेकिन तुम्हें ना हो सका उसका जरा भी भान साअब क्या करे कोई तुम्हारी सोच तो बदली नहींतुमको भी साथी चाहिए एक जादूगर धनवान सासोचा बहुत रोका बहुत पर फिर भी देखो ना थमाआज भी उठता है दिल में एक बड़ा तूफान सा देखते हो क्या मकां ये इसमें कोई घर नहीं एक खंडहर है फकत टूटा हुआ वीरान सा दौलतें जग की मिलें पर ना मिले गर साथिया मधुकर बना रहता है फिर इंसान इक अनजान साशिशिर मधुकर

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4 Comments

  1. C.M. Sharma 22/05/2019
    • Shishir "Madhukar" 22/05/2019
  2. डी. के. निवातिया 22/05/2019
    • Shishir "Madhukar" 22/05/2019

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