माँ के बिना – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

रोता नहीं सिसकता हूँ मैंमाँ के बिना तरसता हूँ मैं,वो सारी बचपन की यादेंअपने दिल में रखता हूँ मैं।उनको कैसे भूल मैं जाऊँअपने आप सिमटता हूँ मैं,वो आँचल की छाँव कहाँ हैमाँ के बिना भटकता हूँ मैं।चलना हमे सिखाया जिसनेफूलों सा महकाया जिसने,उनको वापस कैसे लाऊँलोरी नींद में गाया जिसने।खालो बेटा भूख लगी हैमैं सोया वह रात जगी है,मैं तो अभी-अभी है खायाऐसा कह वह मुझे ठगी है।उसने सींचा बचपन मेरायाद रखी थी हर क्षण मेराजिग़र का एक टुकड़ा था मैविचलित हुआ नहीं मन मेरा।माँ तुम मुझसे दूर गयी क्योंहमको ऐसे भूल गयी क्यों,माँ मै कैसे रह पाऊँगापंच रत्नों में घूल गयी क्यों।वो तावे की गर्म रोटियाँवो पत्थर की बनी गोटियाँ,अभी भी याद है वह मुझकोवो लम्बी बचपन की चोटियाँ।माँ से बड़ा न दूजा कोईइससे बड़ा न पूजा कोई,मंदिर – मस्जिद सब बेकारमुझे अबतक न सूझा कोई।स्वर्ग से क्या कम है माईकालों के भी यम है माई,हमें इस पर गर्व है करनादुनिया की दमखम है माई।ममता, प्रेम की सागर है माँकरूणामयी गागर है माँ,उनकी सेवा भक्ति करनाघर – आँगन की जैसी है माँ ।

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  1. C.M. Sharma 22/05/2019

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