नजर के खेल – शिशिर मधुकर

आया वो मेरे सामने तो वक्त थम गया उसकी नजर के खेल में मैं तो रम गयाहर तरफ उदासियों का एक हुजूम था देखा उसे तो दूर मेरा हर इक गम गया वो चाँद सा चमका जो आकाश में जरा जाने कहाँ नभ छोड़ के सारा ये तम गया वो दूर जा रहा था मुझे छोड़ जिस घड़ीचूम के माथा मेरा बस देता मरहम गयाजाने ख़ुशी का जोर था या गम का दबदबा आंखों की कोर मेरी करता वो नम गया वो ना मिलेगा अब मुझे उसने जरा कहा खून ये मेरा तो देखो फिर से जम गया प्यार है ये रूह का ना तन की बात करमधुकर से यही बोल वो चलता कदम गयाशिशिर मधुकर

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2 Comments

  1. डी. के. निवातिया 09/05/2019
    • Shishir "Madhukar" 09/05/2019

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