नाउम्मीद:-विजय

ज्यों-ज्यों हौसला टूट रहा
मन में है गुस्सा फूट रहा
हर नाव किनारे डूब रहा
हर सपना अपना झूठ रहा

अब अपना ही हम पर टूट रहा
अपना साया भी हमसे रूठ रहा
अब तक जो दोस्तों का गुट रहा
उनका भी दामन अब छूट रहा

आशा का घड़ा अब सूख रहा
जीने का न अब भूख रहा
जिस महफ़िल में मेरा रसूख रहा
उसके काबिल भी न मुख रहा

अंदर ही अंदर अब घूंट रहा
गम के कुँए में कूद रहा
जीने के काबिल दुनिया न रहा
दिल मरने का बहाना अब ढूंढ़ रहा

4 Comments

  1. C.M. Sharma 08/05/2019
    • vijaykr811 10/05/2019
  2. Bindeshwar prasad sharma 08/05/2019
    • vijaykr811 10/05/2019

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