सब मिट्टी हो जाता है

जो भी छूता हूँ आजकलसब मिट्टी हो जाता हैस्वपन ,स्वपन ही रह जाता हैजितना उठाने की कोशिश करता हूँउतना ही भरभराकर अस्तित्व मेरा गिर जाता हैमिट्टी का बूत हूँलड़ते-लड़ते ज़िन्दगी सेआखिर मिट्टी में ही मिल जाऊँगा शेष नहीं रहेगा कुछ बस अवशेष बन कर रह जाऊंगादो गज जमीन के भीतरज़िन्दगी के तोड़े हुए हौंसलेदफन होगीहाथ की लकीरों में जो थी नहींवो किस्मत दम तोड़ेगीमिट्टी से बना हूँ आखिरपर कोई मूरत ना बन पाया जो पूजा जाता देवालयों मेंमैं तो तिरस्कृत हो करबस धूल बन कर रह जाऊँगाखैर ,जो भी होमिट्टी में तो मिल पाऊँगा.-अभिषेक राजहंस

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