संकल्पित – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

संकल्पितसबको अपने रंगों से, प्रमुदित तो वह कर दियाअपने ही कौशल से, अचंभित तो वह कर दिया।

प्रखर चाँद सा चेहरा में, इक धब्बा छोड़ा थाघमंड न हो इसलिए, कलंकित तो वह कर दिया ।खूब सजाया प्यार से, दिल अपना कुरवान कियाजान बूझकर उसने, ससंकित तो वह कर दिया ।मत कर गुमान कभी तुम , देखो रावण हारा हैअंत समय आया जब, समर्पित तो वह कर दिया।किस खेत की मूली हम, अहम काम न आयेगाबाग डोर ले हाथों में , संचित तो वह कर दिया।सत्य साथी है सभी का, इस पर सब विश्वास करोहमें पुष्पित कर के उसने, सुरभित तो वह कर दिया।अपना फर्ज निभाओ तुम, कर्म हमेशा याद रहेक्यों गिरते गड्ढों में तुम, प्रकाशित तो वह कर दिया।माया – लोभ से वंचित , पाप न ऐसा कर लेनातेरा सब कुछ देकर, संकल्पित तो वह कर दिया।

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