तुम अब हो ही नहीं

सब कुछ तो है अब मेरे पासपर तुम अब हो ही नहींबेतरतीब सी बिखरी हुई ज़िन्दगीअब संवरने लगी हैतुम्हारी यादों को ये समेटने लगी हैमुझे आज भी याद है कैसे तुम मेरे कमरे की बिखरी हुई चीजो को समेटने लगी थीकैसे हर चीजो को उसकी सही जगह पर रखने लगी थीपर देखो नाकमरे सजाना तो सीख गया मैंपर तुम अब हो ही नहींतुम्हारे जाने के बाद नामैं अब मेरे कमरे में हीअजनबी जैसा लगता हूँतुमने समझा था मुझेपर तुम्हारे जाने के बाद नखुद को भूलने लगता हूँतुम्हारी रखी चीजो को फिर से बिखेर देना चाहता हूँक्या पता ,एक बार फिर तुममेरी चीजो को समेटने लौट आओगीऔर फिर तुम्हारी यादों की जगह तुम रहने लगोगीऔर मैं इस बार सांकल दरवाजे पे चढ़ा दूंगा-अभिषेक राजहंस

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2 Comments

  1. डी. के. निवातिया 25/04/2019
  2. C.M. Sharma 26/04/2019

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