तुम कहते हो तवायफ है वो!!

जिस्म को पेशा बना पेट की आग बुझाती है है वो
खुद तड़प कर तुम्हें कुछ क्षण सुख के दे जाती है वो
चंद कागज़ के टुकड़ों पर ईमान दफन कर जाती है वो
तेरी एक वाह के खातिर
पैरो के जख्म भूल ठुमके लगाती है वो
तवायफ कहते हो उसे ना तुम
मैं कहता हूं वो तवायफ नहीं
मेरी सोच से परे एक नाज़ुक परी की
उसपर हुए जुल्म की वक्त से शिकायत है वो
और तुम कहते हो तवायफ है वो!!
नीच गिरी हुई बाज़ारू कहकर वो पुकारी जाती
इतनी जिल्लत तो नरक मैं भी ए खुदा नही वो पाती है
आंसुओ के घूट पीती है हरदम
एक मुस्कान से अपनी उस जाम में
तुम्हारे सारे गम पी जाती है
भागने की सज़ा मुक्कर होती है जो
रोज़ नुकीली कीलें जिस्म पर अपने पाती है वो
सोचता हूं तो मेरी रूह कांप उठती है
न मरने दिया जाता है ना जीने
जख्म लेकर भी हस्ते हुए जी जाती है वो
तवायफ कहते हो उसे ना तुम
मैं कहता हूं वो तवायफ नहीं
नामर्दो से की गई इंसानियत पे
कातिलाना घिनोनी हिमाकत है वो
और तुम कहते हो तवायफ है वो!!
एक नन्ही कली बन जब कोठे मैं आती है
बनूँगी मैं भी दुल्हन सपने वो सजा जाती है
खता जब समझ आती है उसे उसकी
बिक चुकी होती है वो जुए में कहीं
थी कौन मैं क्या अब हूं यही सोच सिसक जाती है वो
तवायफ कहते हो उसे ना तुम
मैं कहता हूं वो तवायफ नहीं
एक पहचान को तरसती परछाई की आहट है वो
और तुम कहते हो तवायफ है वो
तवायफ है वो!!
पालती है नाजायज़ जानो को बिन सवाल किए
अगर सोचती हूं तवायफ वो तो भला कैसे वो जिये
कितनी पावन थी वो कली गंगा की तरह
मैली हुई जो आज है सबके पाप धोते धोते
मिट्टी बिन जिसके अँगने की आज भी
न प्रतिमा दुर्गा की पूरी हो पाती
तवायफ कहते हो उसे ना तुम
मैं कहता हूं वो तवायफ नहीं
खुदा की ही हम जैसी हसीन इनायत है वो
और तुम कहते हो तवायफ है वो
तवायफ है वो!!

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3 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 25/04/2019
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 26/04/2019
    • Yugal Pathak Yugal 26/05/2019

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