ये वक़्त है ना

ये वक़्त है नाकिसी का ये सुनता कहाँ हैकिसी के रुकने से रुकता कहाँ हैंदिन, रात या सुबह और शामठिठुरती हुई सर्दी या तपती गर्मीउमड़ते बादल या बरसते मेघसब बस दुहराता चला जाता हैये वक़्त किसी को याद नहीं होताजिनके हक में जितना होगाये वक़्त उन्हें उतना देता हैकिसी के हिस्से में गुमनामियाँतो किसी को शोहरत देता हैंकिसी के ज़िन्दगी कावक़्त कोई मोल नही देतातो किसी को अपनी तारीख ही दे देता हैये वक़्त किसी को तोड़ जाता हैतो किसी की ज़िंदगी को मोड़ जाता हैये वक़्त है नाबचपन को यौवन और यौवन कोबुढापा दे जाता हैकिसी को किसी का यार बना जाता हैकिसी से नफरत भी करवा देता हैये वक़्त किसी को सबकतो किसी को जीने का तरीका सीखा जाता हैकितना मुश्किल है इसका हिसाब करनाअगर रुक जाए तोवक़्त हाथ से फिसलता चला जाता हैबड़ा ही स्वार्थी मिजाज है इसकाये बस अपनी धुन में गुनगुनाता रह जाता है-अभिषेक राजहंस

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  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 22/04/2019
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/04/2019

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