वचन – शिशिर मधुकर

वो मुझको सताता है मजबूर बन के मगर तार जुड़ते हैं उससे ही मन के जमाने से डर के वो छुप सा गया हैमगर मैं डटा हूँ फिर भी लो तन के खुशियां मेरी लौट के आ गई हैं पायल की उसकी घुंघरू जो खनके गेसू की छाया जो वो मुझको दे दे गुजर जाएंगे फिर ये दिन भी अगन के तेरी बौखलाहट से कुछ भी ना होगा बीमार आशिक हैं पक्के जहन के कोई बात रुकने की तब तक ना होगी थमेंगे ना जब तक इशारे नयन के भले तू मुकर जाए बातों से अपनी मधुकर से रहते हैं पक्के वचन के शिशिर मधुकर

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4 Comments

  1. Rajeev Gupta 22/04/2019
    • Shishir "Madhukar" 22/04/2019
  2. डी. के. निवातिया 22/04/2019
    • Shishir "Madhukar" 22/04/2019

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