सितम – शिशिर मधुकर

ये खुशबू फिजाओं में जो आ रही है लगता है बालों को तू बा रही है मचलती हैं पत्ती हँसते हैं गुल भी तरन्नुम में लगता है तू गा रही है नज़रों से मय अब ना इतनी पिलाओ मदहोशी मुझपे अधिक छा रही है ना सन्देश कोई ना मिलने का वादा इतना सितम अब तू क्यों ढा रही है ये लोगों में हलचल चेहरों पे रौनक समझता है मधुकर कि तू जा रही है शिशिर मधुकर

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2 Comments

  1. C.M. Sharma 20/04/2019
    • Shishir "Madhukar" 20/04/2019

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