सयाना- शिशिर मधुकर

अगर कोई मिल के भी तुम को मिले नादर्द ऐसा दिल को बहुत सालता है ना पीछा छुड़ाता है इंसान इस से सपनें उम्मीदों के नित पालता है वो मंदिर में जाता है मिलने हरि को मगर कोई मूरत अभी तक ना बोली छोड़ी नहीं है पर आस उसने वो श्रद्धा के दीपक नित बालता है खुली बात करने से सुलझेगा मसला उसे भी पता है सयाना सा है जो करोगे शुरू जो जिक्र अपने दिल का हंस के सवालों को वो टालता है ना दूरी बढ़ाए ना नजदीक आएमन में ना जाने क्या राज होगा मगर मुझको अपना सा लगता है हरदम नजर अपनी देखो वो जब डालता है यही दौर चलता है मुद्दत से देखो नहीं बात कोई संभलने में आई बेबस है मधुकर ऐसे में पूरा खुद को समय के संग ढ़ालता है शिशिर मधुकर

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