देश

1 कहने से कोई यूँ ही तलबगार नहीं होता शमशीर रखने से कोई पहरेदार नहीं होताफडकती हैं बाजुऐं जुनून सब जोश से बिना पसीना बहाऐ देश से प्यार नहीं होता2 एक दबी चिंगारी में ही क्रांति होती है हर जलजले से पहले शांति होती है3 यूँ ही नहीं रण बेदी पर वक्त को हमने जीता है हर बालिका लक्ष्मीबाई बालक हमारा चीता है4 कहाँ से लाऊँ चन्द्रशेखर,सुभाषनीयत हमीद, कलाम सीनस नस में भरी पड़ी हैं दिमक नमकहराम कीजिस मिट्टी ने पाला पोषाजिसने सींचा ये तन मनखुद अपने घर को उजाड़ेजयचंद बन कभी दुर्योधनसिर्फ नफरत की आदत हैदहशत का चढा रंग तुम्हें भारत में रहकर भी ना आयाजीने का कभी ढंग तुम्हें5 बड़ा मुस्किल अब मुस्काना हो गया बेरहम बड़ा अब जमाना हो गया फड़फड़ाते रहे हैं लोग सूखे पत्तों से रोंधकर गुजरना ,फैसन पुराना हो गया मैंने देखी हैं रातें भूख में लिपटी हुईतंगहाल हँशने का बहाना हो गया कोई कैसे खाऐ रोटी अपने हक कीहर टुकड़ा सियासी निशाना हो गया

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