पतंग…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

पतंग…एक लफ्ज़…या…ज़िन्दगी का गूढ़ रहस्य…हमेशा मेरे विचारों में….उथल पुथल मचाता रहा…खंगालता रहा मुझे…और मैं…उड़ता रहा….भावों के पंखों पे सवार…जानने के लिए…पतंग उड़ती कैसे है… स्वछन्द…कैसा लगता होगा…इसे…अबोधपन कहो या जिज्ञासा…कुछ भी कहो आप…पर मैं पतंग को जानना चाहता था…बचपन में पतंग बनाना….फिर उड़ाना…एक दूसरे की काटना…कटी पतंग को लूटना…मजा आता था….अबोधपन था शायद….जवानी में जोश संग…बहुत ज़ियादा समझ आ गयी…अपने मन को…पतंग की मानिंद उड़ाने लगा…देह को संवारने लगा…रंग बिरंगे वस्त्रों से…कभी वस्त्र कम कर दिए…कभी शरीर पे रंग बिरंगे चित्र बना…’पतंग’ सजा ‘मैं’ खूब इतराया….अब ‘पतंग’ पतंगा बन गयी…बहुत उड़ी यहां वहां…सब ने अपनी मर्ज़ी से तुनके मारे…उड़ाया…बहुत मजा आया….फिर… जब कटी… होश आया…याद आया दूसरों की पतंग…काट कर मजा लेने का हश्र….संभाला… खुद को…फिर… घर गृहस्थी में….अपने को भगाता रहा…उड़ कर कटूंगा एक दिन…जानता था… फिर भी उड़ा…मजबूरी थी… कर्तव्य था…या कहीं विश्वास कि शायद…मेरे साथ मेरा परिवार…’पतंगें’…मुझे थाम लेंगी….पर…फिर कटा…धड़ाम से…होश आया तो पाया…मेरी डोर तो मेरे हाथ नहीं थी…रे मना…फिर क्यूँ उड़ा…डोर…मैं पकड़ रखने के काबिल नहीं था…मन रुपी पतंग टूट चुकी थी…डंडी कहीं तो डोर कहीं…फिर एक दिन….सधी आत्मा के सधे हाथ मिल गए…मेरी ‘पतंग’ को ‘डंडी’ मिल गयी….’साधक’ ने डोर रुपी सांसों को…मांजना सिखाया….भावों की ‘तनियों’ का सामंजस्य बिठा…आत्मा के संग जो गाँठ बाँधी….’पतंग’ को उड़ने का ‘आनंद’ आया…समझ आया…सधी पतंग के उड़ने का…’उस आसमाँ’ में विचरण करने का…\/सी.एम्.शर्मा (बब्बू)

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4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/04/2019
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 16/04/2019
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 06/04/2019
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 16/04/2019

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