इश्क़ था शायद

हाँ, कहना था तुमसेपर कभी कह नहीं पायाबाते बेहिसाब करता था खुद सेपर तुम्हे देख कर अक्सरखामोश सा हो जाता थामुझे कहना था बहुत कुछ तुमसे कीजब तुम अपने बाल खुले रखती होक्या कहूँ क्या गज़ब लगती थीतुम्हारे वो झुमकेजो तुम पहन के निकलती थीमुझे तो वो मंदिर की घंटियां जैसी लगती थीतुम्हारे ओंठ के ऊपर जोछोटा सा काला तिल है नाउसे देखकर मैं ठहर सा जाता थाहाँ, नहीं हुआ था पहले कभीपर जबसे तुम्हे देखा हूँमुझे होने लगा थाये इश्क़ था शायदवो भी एकतरफातुमसे पूछे बिनातुमसे होने लगा था—अभिषेक राजहंस

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