बेदर्दी बदरी – अरुण कुमार झा बिट्टू

मैंने बेदर्दी बदरी से उम्मीद लगा कर रखी हैं ।देखो कब वो बरसती हैं । देखा तो मुझको करती हैं ।उसके नैना बेदर्दी हैं । बेदर्दी हैं उसके सारे नज़ारे ।जो एक नजर उसे देख ले तो बूढ़े भी जवानी को मांगे ।उसकी लम्बी कद यारो , नस नस में भरी हुई जवानी ।वो जब इतरा कर चलती हैं , जवानी मांगती हैं पानी ।क्या कहूं उसके बदन में , उभार बड़े बखूबी हैं ।कमर तो उसकी पतली है , मदमस्त कुछ उभरी भी हैं।उसका गोरा मुखड़ा हैं । नैनो में डाले हैं कजरा ।उसके होठ मानो जैसे कोई गुलाब का हो पंखुरा ।उसकी बिंदिया ने ही तो छीनी सबकी निंदिया हैं ।उसपे मारने वालों में ये सारा अपना इंडिया हैं ।उसकी जुल्फे घटा कली , जैसे घनघोर कोई बदरा ।उसको देख के लगता है जैसे देखा कोई सपना ।ये कोई और नहीं यारो ये तो मेरी कल्पना हैं ।जो लिख दिया मैंने पन्नों पर तो बन गई ये रचना है।

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  1. vijaykr811 30/03/2019

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