ख़्वाब – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

ख़्वाब ही कुछ ऐसा था जो अधूरी रह गयीगिरेबान में झाँका नहीं जो दूरी रह गयी।खामख्वाह परेशान होते रहे जिंदगी भरमृग की तरह ढ़ूढता रहा पास कस्तूरी रह गयी।अंह करना मेरे लिए यह भारी पड़ गयाजिंदगी भर के लिए ही जी हुजूरी रह गयी।नदानियों की असर समझ में आने लगी अबना जाने समझ में कैसी मजबूरी रह गयी।बैखौफ रहा जमाने से जिंदगी निकलती रहीजान नहीं पाये अंत में यह झिंगूरी रह गयी।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दुबाढ़ – पटना

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  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/03/2019
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 11/03/2019

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