आज की नारी – डी के निवातिया

आज की नारी

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घूँघट त्याग, नज़र से नज़र मिलाने लगी है,नारी शक्ति अपनी ताकत दिखाने लगी है !!

घुट-घुट के जीना बीते दिनों की बात हुई,खुलकर जिंदगी का लुफ्त उठाने लगी है!!

छोड़ दिया है उसने चारदीवारी में कैद रहना,देहरी के बहार भी अब कदम जमाने लगी है!!

सीख लिया है कतरे हुए परों से भी उड़नापरचम आकाश में भी  लहराने लगी है !!

कल तक रही जो बनकर नाज़ुक कलीआज खुशबू चारो और बिखराने लगी है !!

छोड़कर दकियानूसी रीती रिवाज़ो कोनई दुनिया में, कदम बढ़ाने लगी है !!

जल, थल, वायु, कुछ नहीं रहा अब अछूतादर दिशा में ताकत अपनी आज़माने लगी है !!

अब डर नहीं लगता इन्हे मानुषी भेडियो सेबन सिहंनी, गर्जना से अपनी डराने लगी है!!

क्या हिमाकत किसी रावण की, उड़ा ले जाएबहरूपियों को सबक खुद ही सिखाने लगी है !!

भूल जाए दुनियाँ अब चौसर के दाँव पे लगानाअब धर चंडी का रूप आत्मरक्षा पाने लगी है !!

लक्ष्मी, विद्या, सरस्वती, संग नौ दुर्गा रूप लिएवक़्त की नज़ाकत से कर्म अपना निभाने लगी है !!

है आज भी वही ममता, प्रेम और त्याग की मूरतये न समझना “धर्म” अपने से नज़रे चुराने लगी है !!!!!स्वरचित: डी के निवातिया

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6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 09/03/2019
    • डी. के. निवातिया 14/03/2019
  2. C.M. Sharma 11/03/2019
    • डी. के. निवातिया 14/03/2019
  3. Rajeev Gupta 12/03/2019
    • डी. के. निवातिया 14/03/2019

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