रचनाएँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

विद्या – दोहाजो मांगो मिलता सदा, भोले से वरदाननिर्बल को भी देखिए , है तेरा संतान।दानव को वर में दिया, जो मांगा मुँह खोलहम मानव डरते रहे, समझ न पाये मोल।हम गरीब का सारथी, मिले नहीं अब कोयभटक रहे इंसान सब, गये राह में खोय।दबंगई के जाल में , फंस गये हैं लोगकृपा थोड़ी आप करो, तो कुछ हो सहयोग।”बिन्दु” निवेदन कर रहा, आशा में कर जोरबल- बुद्धि- विद्या दीजिये, रहे प्रेम का डोर।2कुंडलियाँलात का देव बात से, माना पहली बारअलग-थलग है पड़ गया, झेल न पाया भार।झेल न पाया भार, लगा है छट – पट करनेअभिनन्दन था काल , लगा वह इससे डरने।हिला दिया सरकार , जेहादी खाये मातहारा पाकिस्तान , जब उससे खाया लात।3पतझड़ धमक है गया, ठोक के अपनी तालशिशिर ऋतु की आगमन, वाह रे इसकी चाल।अमृत फाल्गुन – चैत, पतझड़ उसका अंगहरियाली को करता , वह सबसे पहले भंग।वन उपवन – बाग चमन, झड़ते उनके पत्तेसूना सा दिखने लगता, लगते हैं अलबत्ते।माघ मास दस दिवस, फागुन – चैत – बैसाखतरु में आती कोपलें , सजती हर इक साख।लगते मंजर आम्र में, महुआ गया कुचियायबाग – बगिया सज गये, उनके फूल सुहाय।हवा बसंती झूमती , गम – गम महके फूलआम लीची फल गये , सोंधी उसके धूल।विरह दिल है बावरा, जिअरा जलि – जली जायमधु मास की है तड़प , प्यासा मन मुरझाय।कोयल कूके राग में , नचे मोर बाग मेंबौराया भौंरा है , तितली के अंदाज में।खुशियों का त्योहार , होली फागुन मासबैरी मन छोड़ के , संग करते उल्लास।ऋतु बसंत श्रृंगार का , अद्भुत प्रकृति रूपपतझड़ इसके साथ में, सुंदर – सौम्य – अनूप।4आँखें खोलो बहुत सो लियेअपना अस्तित्व बहुत खो दिये।गीदड़ वाली चाल बदल दोपाक तुम कांटे बहुत बो लिये।हद लांघी तो मिट जाओगेथोड़े में ही सिमट जाओगे।अपनी पहले करनी देखोएक – एक तुम घट जाओगे।दायरे में तुम सीखो रहनाबहुते उड़ लिये अब न उड़ना ।छलिया नीति अब भी छोड़ोधूल में मिल जाओगे वरना।अपने को तुम शेर न समझोबहुत थोड़ा को ढ़ेर न समझो।अर्थ व्यवस्था ठीक करो तुमकर्ज मिला है भीख न समझो।आतंकी को दूर करो तुमअजहर मसूद सूट करो तुम ।जैश को अब दो तुम फांसीसपनें चकनाचूर करो तुम।गरीबी दूर होगी तेरीमान लो नसीहत ये मेरी ।डंका तेरा खूब बजेगाख्वाहिशें तेरी होंगी पूरी।5तेरे घर में घुस कर मारेफिर भी कहता कहाँ तुम आए।तेजस से था बम बरसायाशर्म करो कि तुम सब घबराए।चालीस के तीन सौ मारावायू विमान कुल थे बारा।सैनिक इनके वीर लड़ाकाचलने दिया न उसका चारा।समझा नहीं बौखलाया हैअपना राग वह फिर गाया है।कोई साथ न देगा तेराबचा क्या बस तेरा साया है।ज्यादा उड़ना अब भी छोड़ोअपना प्रण तुम मन से तोड़ो।करनी का फल तुम्हें मिलेगासंम्भलो फिर तुम हाथें जोड़ो।क्यों चाहते हो तुम बर्बादीखत्म होगी तेरी अवादी।फिर से ऐसी गल्ती न करनामिटता दिख अब रहा जिहादी।नहीं चलेगी अब मनमानीहो जायेगा पानी – पानी।साथ न देगा कोई तुमकोकुछ अब तुम न करना नादानी6चौकस रहना ठीक है किन्तु युद्ध विकल्प नहीं होतेयुद्ध में हालत पतली होती काया कल्प नहीं होते।जान – माल की हानी होती क्षति भी अल्प नहीं होतेधोर चिंतन की बात है साथी ऐसे गल्प नहीं होते।7इतना उम्दा काम किया हैदेश का ऊँचा नाम किया है।पाकिस्तान में छुपे आतंकीउस पे जम कर वार किया है।56 इंच सीना की ताकतअब सब लोगों ने देखा है।थर – थर काँप रहा पाक हैजब बम जोसस ने फेंका है।वायू सेना की ताकत हैये बदला है पुलवामा का।चालीस के बदले चार सौप्रतिशोध है पंचनामा का।यही चाहता था हिन्दुस्तानगर्व से मस्तक अब उँचा है।आतंकवाद के कैम्प को देखोतहस – नहस करके कूँचा है।8 

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  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 06/03/2019

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