मेज़ पर पड़ी कलम

मेज़ पर पड़ी कलम पुकारती है तुझे,खींचती है तुझे भावों की डोरी से..सुनाती है कभी आधी, कभी पूरी कहानी,तेरे लफ़्ज़ों को गाती है अपनी ज़ुबानी..मेज़ पर पड़ी कलम पुकारती है तुझे…कहती है..तुम मेरे पैर बनो, मैं तुम्हारे हाथ..कभी तुम दो मुझे सहारा, कभी मैं दूँ तुम्हारा साथ..गर शब्दों के बीच उलझोगे तो सुलझा लूंगी मैं,पर जज़्बातों में बहोगे तो बहने दूँगी मैं…मेज़ पर पड़ी कलम पुकारती है तुझे…स्याही-स्याही पिरोती है शब्दों की माला,तेरे मन की चिंगारी को बनाती है ज्वाला..है चाक़ू सी तेज़ी और तलवारों सी धार,साधारण डील-डौल, पर असाधारण वारमुश्किल है ये कहना कि कौन किसका साथी है..कलम ही तेरा अर्जुन, तेरा कृष्ण, तेरा सारथी है..मेज़ पर पड़ी कलम पुकारती है तुझे…

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6 Comments

  1. C.M. Sharma 06/03/2019
    • Garima Mishra 06/03/2019
  2. डी. के. निवातिया 11/03/2019
    • Garima Mishra 29/03/2019
  3. Subash 18/03/2019
    • Garima Mishra 29/03/2019

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