लाचारी – शिशिर मधुकर

मिलन की आरजू पे डर ज़माने का जो भारी हैतेरी मेरी मुहब्बत में अजब सी कुछ लाचारी हैदोस्तों दोस्ती मुझको तो बस टुकडों में मिल पाईबड़ी तन्हा सी मैंने ज़िन्दगी अब तक गुज़ारी हैभले तुम अजनबी से अब तो मुझसे पेश आते होतेरी सूरत ही मैंने देख ले दिल में उतारी हैभुलाना भी तुम्हें अब तो कभी आसां नहीं लगता मेरे हर क़तरे क़तरे में बसी खुशबू तुम्हारी हैकोई हँसता हुआ चेहरा अगर तुमको दिखे मधुकर मुहब्बत ने समझ लो उसकी ये सूरत निखारी है शिशिर मधुकर

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