शोलो से लड़ना होगा – डी. के. निवातिया

शोलो से लड़ना होगा
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सहते – सहते, सह  रहे है हम,सदियों से आतंक की अठखेलियां, कितने आये कितने गए सत्तारूढ़ बुझा रहे आजतक सिर्फ पहेलियाँ,कुछ तो खामी होगी शाशको में जिसकी मार केवल जनता सहती है,खुद रहते है बेफिक्र मुस्तैद घेराबंदी मेंजान, माल की हानि तो प्रजा सहती हैहम नहीं कहते के तुम युद्ध करो युद्ध किसी समस्या का हल नहीं होता,कोई ज़ख्म अगर नासूर बन जाएइलाज़ उसका इलाज़ सम्भव नहीं होता,    माना के लोहे को लोहा काटता हैमगर ध्यान रहे आग से आग नहीं बुझती, कुछ ज़ख्म प्रतिशोध की ज्वाला जगाते है      लेकिन जोश में होश गंवाना बुद्धिमानी नहीं होती, इस समस्या का हल हमे ढूंढना होगा हल ढूंढने के लिए पहले अपने घर में झांकना होगा, शाशन हो या प्रशाशन की लापरवाहीलोलुपता की लिप्तता को जड़ से उखाड़ना होगा,जनता की आँखे बंद है,  कैसे उनको खोला जाए,शिक्षा पाकर जो अनभिज्ञ है कैसे उन्हें बोला जाएसत्ता के भूखो का अब सफाया करना होगा राजधर्म का पालन कैसे हो ये सिखाना होगा एक बार जो सत्ता में पद पाए, आगे पाबंदी होवेतन भत्ते या पेंशन सुविधा इनसब की बंदी होलाल बहादुर जैसे नेता हमे फिर बनाने होंगेआज़ाद सुभाष जैसे वीरो के नाम रटाने होंगेसुन लो मेरे देश के प्यारो, भगत सिंह फिर बनना होगा गाँधी की सत्य अहिंसा नीति संग शोलो से लड़ना होगाजागो देश के प्यारे जागो, वक़्त नहीं अब सोने का शैय्या पर जब पड़ी माता, वक़्त नहीं फिर खोने का पढ़लिखकर हुए बुद्धिमान, शरीर से भी बलिष्ठ हुए मस्तिष्क क्यों बंद किया, जानो क्यों ये अनिष्ट हुए राजनितिक दल परस्ती से, ऊपर उठकर काम करो माटी को गर माँ समझा, वैसा ही फिर सम्मान करो !!!जय हिन्द ,,,,,,,,,,,जय-भारत,,,,,,,,,,,वन्दे मातरम्!डी के निवातिया

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