दर्द का बंधन – शिशिर मधुकर

अब रिश्तों की बात न कर हर इक रिश्ता झूटा हैप्रेम का धागा सब रिश्तों में देखो लगभग टूटा है दर्द का बंधन ढूंढे से भी ना मिलता है अब जग में अपनों ने भी भेष बदलकर मुझको जमकर लूटा हैएक ममता ही सच्ची थी बाकी तो बस धोखा थाऐसी माँ का साथ भी तो आखिर में देखो छूटा हैखूब बजाकर देख लिया आवाज़ ना वो आने पाई हर घट अब इस जीवन का देखो भीतर ही से फूटा हैप्रेम का जल जिस बगिया में बरसेगा ही न मधुकरलाख मना लो उस मिट्टी में उगता ना कोई बूटा हैशिशिर मधुकर

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2 Comments

  1. C.M. Sharma 05/02/2019
    • Shishir "Madhukar" 05/02/2019

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