मुहब्ब्त की प्यास – शिशिर मधुकर

मिलन की चाह की देखो फ़कत बातें वो करता हैकभी कोशिश करे ना कुछ पास आने से डरता हैकोई सच्ची मुहब्बत अब न उसके पास है देखो मुझे भी इल्म है इसका मैंने कितनों को बरता हैमन की बगिया के सारे फूल अब मुरझा गए मेरीना वो आँखों में आँखें डाल अब बाँहों में भरता है वार मौसम भी करता है दोष उसका नहीं केवलहवाएं गर्म होने पे कहाँ हरसिंगार झरता हैमुहब्बत की प्यास जिसकी बुझाने को न कोई हो वो इंसान तो बस मधुकर तड़प तन्हा ही मरता हैशिशिर मधुकर

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2 Comments

  1. C.M. Sharma 05/02/2019
    • Shishir "Madhukar" 05/02/2019

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