जन्नत नहीं मिलती

बड़ी खूबसूरती से हम बटते जा रहे हैंअफसोस हम कटते जा रहे हैंये फासले एक दिन खाई बन जाएंगेवो दिन भी दूर नहीं हम कसाई बन जाएंगेबनकर तो आए थे वहां से हम हाड मास के हीमगर यहां टोपी और तिलक में बटते जा रहे हैंयूं देखा तो मैंने हिंदू को मजहार,मुस्लिम को दरबार में भी हैपर कैसे मैं अपनी आंखें बंद कर लूंजब एक सीमा पर पत्थर लिए तोदूसरे के हाथ में गाय के लिए तलवार भी हैमिसाले भाईचारे की भी कम नहीं है मेरे मुल्क मेंपर देखें तो मैंने दंगे फसाद भी हैंदर्द बिछड़ने का अपनों से समझ भी तो हम ही सकते हैंबड़े बेगैरत हैं हम दोनों ही औरों के कहने पर लड़ भी तो हम ही सकते हैंजैसे मानो सोचना तो बंद ही कर रखा हैसिर्फ उसी की बात को खुदा कर रखा हैअगर जो आज शंकर या रसूल होतेक्या उनके भी कुछ ऐसे ही उसूल होतेधर्म,मजहब,मंदिर,मस्जिदये कोई बुरी शिक्षा ,तालीम नहीं देतेऔर जो लड़ते हैं ना एक दूसरे सेवो इनमें कभी लीन नहीं रहतेबस भाग रहे हैं हम धर्म को बचाने के लिएमौत के बाद जन्नत पाने के लिएहमें एक ऎसे स्वर्ग की कल्पना में लड़ रहे हैंजिसके लिए आज हम नर्क में जी रहे हैंऔरतों को विधवा बच्चों का अनाथ करना मुनासिब नहीं होगाऔर खून बहा का अपनो का ही कोई स्वर्ग हासिल नहीं होगा

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