कविता-मर्मज्ञ काव्यसाधक थे ‘आचार्य रूपेश’

– देवेश शास्त्री
—————-
1 फरवरी 2019 शुक्रवार  को जुटेगा मंचीय कवियों-काव्यसाधकों का मेला
शुक्ल परिवार बूढ़ादाना एवं हिमांगिनी साहित्य समिति द्वारा दिवंगत महाकवि रूप नारायण शुक्ल ‘‘रूपेश’’ की पुण्यस्मृति में कल 1 फरवरी 2019 शुक्रवार  को अपरान्ह 2 बजे से पक्का तालाब स्थित हिमांगिनी पब्लिक स्कूल  में ‘‘आचार्य रूपेश कवि-गोष्ठी’’ आयोजित हो रही है, जिसमें अखिल भारतीय स्तर के मंचीय कवियों और काव्यसाधकों का अनुपम संगम होगा। यह साहित्यिक मेला अपने आप में अनोखा होगा। ‘मंचीय कवियों’ का उत्सव कविसम्मेलन होता है, जिसमें प्रतिस्पर्धा की भावना का मूल्यांकन श्रोताओं की तालियां करती है। किन्तु साहित्यिक क्षीरसागर का मंथन होता है गोष्ठी। कविगोष्ठी मूलतः परिशोधित काव्यामृत रूपी रत्न को निकालती है, इसलिए काव्य-साधक एकत्रित होकर छान्दिक गुण-दोष का पारस्परिक मूल्यांकन करते है। आचार्य रूपेश की स्मृति ‘‘अखिल भारतीयता से मंचीय कवियों और कवि गोष्ठित्व से काव्यसाधकों को आकर्षित करेगी।
उस अनुपम काव्यानुष्ठान के संयोजक रूपेश जी के ज्येष्ठ पुत्र गोविन्द माधव शुक्ल ने बताते हैं कि गोष्ठी में जालौन के कवि रवीन्द्र शर्मा को आचार्य रूपेश सम्मान प्रदान किया जायेगा। गोष्ठी में गीतकार बलराम श्रीवास्तव, कमलेश शर्मा, रोहित चैधरी, डाॅ. राजीव राज,  गौरब चैहान, कुमार मनोज, वेदप्रकाश संजर, सुधीर  बेकस, रश्मि बादशाह, रामप्रकाश अनुरागी, घनश्याम भारती, महेश मंगल, सरगम अग्रवाल सहित देश भर के तमाम कवि पधार रहे हैं। साथ ही औरैया से ओम नारायण चतुर्वेदी, गोविन्द द्विवेदी, अनिरुद्ध त्रिपाठी, तो इटावा के इन्द्रधनुषी कवि, नेमसिंह ‘रमन’ अवधेश ‘भ्रमर’ प्रेमबाबू ‘प्रेम’ अनुराम ‘असफल’  दीपचन्द्र त्रिपाठी ‘निर्बल’, प्रदीप मिश्र, सतीश दीक्षित ‘अनपढ़’ डाॅ0 कुश चतुर्वेदी व देवेश शास्त्री भी आ रहे हैं। संचालन रूपेश जी के कनिष्ठ पुत्र व प्रख्यात कवि अजय शुक्ल ‘‘अंजाम’’ करेंगे। संयोजक माधव ने सभी साहित्यप्रेमी जनों से गोष्ठी में पधारकर काव्यरस का आनन्द लेने की अपील की।
—————————————————-
साहित्य की काव्यविधा जिसे छन्द-षास्त्र के रूप में प्रमुख वेदांग कहा जाता है, जिसके मर्मज्ञ स्वनामधन्य पं0 रूप नारायण शुक्ल की गणना उन काव्यसाधकों में की जाती है, जिनका सर्वस्व काव्यात्मक आभा से प्रदीप्त रहा। महाकवि शिशु, राष्ट्रकवि बल्लभ, अल्लढ़ कवि गिरिजेश और कविराज रत्नाकर शास्त्री के समकालीन कवि पं0 रूप नारायण शुक्ल का जन्म 20 जुलाई 1928 ई0 को औरैया तहसीलान्तर्गत बूढ़ादाना में हुआ था। आप के पिता श्री मथुरा प्रसाद शुक्ल कुशल वैद्य व क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे तथा माता जी श्रीमती रामदुलारी साध्वी धर्मनिष्ठ कुशल गृहिणी थीं। गौरवर्ण, भव्य ललाट, मन्द स्मितयुत तेजस्वितापूर्ण सशक्त स्वर आदि गुणों से युक्त विद्वान मूर्धन्य मनीषी एवं सुसाधुु सरस्वती साधक थे।
शुक्ल जी का अधिकांश समय शिक्षण कार्य करते हुये मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में व्यतीत हुआ। कोरबा शासकीय इण्टर काॅलेज छत्तीसगढ़ के प्राचार्य पद से आप 1986 में सेवानिवृत्त हुये।
संस्कृत विद्वान डाॅ0 मुंशीराम शर्मा सोम ने पं0 रूप नारायण शुक्ल की रचनाधर्मिता से प्रभावित होकर सस्नेह ‘‘रूपेश’’ उपनाम से सम्बोधित किया था, इसी के साथ पं0 रूप नारायण शुक्ल अब उपनाम रूपेश के नाम से ख्याति अर्जित करने लगे। अप्रतिम विद्वान डाॅ0 अमरनाथ जी ने आपको कविता के ‘‘आचार्य’’ की उपाधि प्रदान की थी। डाॅ0 अमरनाथ का मानना था कि आचार्य का तात्पर्य किसी विषय विशेष में जिसका कृतित्व-व्यक्तित्व आचरण के योग्य होता है, वही आचार्य है। निश्चित रूप से पं0 रूप नारायण शुक्ल ‘‘रूपेश’’ की सुसंस्कृत (परिमार्जित) सात्विक जीवन शैली काव्यसाधकों के लिए सर्वथा अनुकरणीय है।
आचार्य रूपेश जी ने अपनी कृति ‘रूपेश्वरी’ के प्राक्कथन में उद्धृत किया है:-
डाॅ0 मुंशीराम ‘सोम’ ने
कह रूपेश मुझे दुलराया।
अमरनाथ ने मुझको
कविता का आचार्य बताया।।
सिद्धहस्त गीत सम्राट आचार्य रूपेश ‘‘प्रेम की पार्थिवता’’ को अलौकिकता की अनन्त ऊँचाइयों तक ले जाते हैं। प्रेम उनके लिये साधन नहीं साध्य था आराध्य था।
पलकों के आवरण उठा दो
अधरों से किंचित मुस्का दो।
पागलपन तुम कहो इस पर
अपना धर्म मिटा लूँगा मैं।
अमूल्य क्षण गुजार कर
बदल बदल नई डगर।
चला हूँ उम्र काटते
न आ सका पड़ाव पर।।
आचार्य रूपेश के साहित्य में हिन्दी प्रेम की भावना प्रवल रूपेण थी:-
हिन्दी ही केवल हो सकती
भाषा हिन्दुस्तान की।
इसमें जबरन टाँग अड़ाना
गलती है श्रीमान की।।
राष्ट्रप्रेम की भावना से ओतप्रोत रहने वाले आचार्य रूपेश के साहित्य में राष्ट्र देवता का स्थान सर्वोपरि है। भारत माता के विखण्डित वेदना विदग्ध अन्तःकरण को देखकर उनका हृदय चीत्कार कर उठता है। इन परिस्थितियों में भी मौन रहने वाले को अक्षम्य मानते थे:-
मैं बताऊँ राष्ट्रदोही कौन है।
राष्ट्र खण्डित देखकर
जो मौन है।।
भारत माता जी रज कण के बदले सम्पूर्ण जगत की अमूल्य निधियाँ को न्यौछावर कर देने की त्वरा रखने वाले आचार्य रूपेश अपने देश की पावन माटी को हीरों जवाहरातों से अधिक महत्वपूर्ण मानते थे:-
स्वर्ण विहग जिस पर सारी
दुनिया की नजर टिकी है।
उसकी मिट्टी तक अमूल्य
हीरों के भाव बिकी है।।
राष्ट्र की युवा शक्ति जो आज संज्ञाहीन पड़ी हुयी है। उसे जागरण के मत्र देते हुये आचार्य रूपेश कहते थे:-
कौन सी संजीवनी
लाकर तुम्हें दूँ।
जागरण के और कितने
मंत्र फूँकू।।
राष्ट्र के सौमित्र क्यों
मूच्र्छित पडे़ हो।
राम के संकल्प को
क्यों और रोकूँ।।
शर्म त्यागकर गद्दियो पर बैठकर आपस में लड़ने वाले राजनीतिज्ञ पर व्यंजना विधा में प्रहार करते हुये आचार्य रूपेश कहते हैं:-
जमाने का चलन कुछ
आजकल है इस कदर बदला।
कभी थे हाय जो कातिल
वे सूबेदार होते हैं।।
कितनी विडम्बना है कि ये किस तरह से चयनित होकर के आते हैंः-
लोग कहते विश्व के
सबसे बड़े जनतंत्र हम।
डाकुओं को साथ लेकर
वोट डलवाये गये।।
किन्तु खेद है ‘‘कि सिंहासन बदले पर बदले नहीं दृश्य जलियाँ वाले’’ इस गागर में सागर समाये हुये यह एक पंक्ति ही समग्र दृश्य को सामने ले आती हैं, हाँ इतना बदलाव जरूर आया है कि:-
जिनको महफिल में बैठने का
अभी तलक न शऊर आया।
तख्तपोशी के बाद उल्मा
अब उनके हुक्के जला रहे हैं।।
आतंकवादियों से त्रस्त हो कर पूरा देश आज गमगीन माहौल में है, व दहशतजदा है। कवि ने इसका निदान अपनी रचना द्वारा बताते हुये सम्पूर्ण राष्ट्र की जनता को ललकारते हुये राष्ट्रसेवा में बलिदानी भाव से समर्पित होने का आग्रह किया है:-
अस्सी कोटि देश के वीरों
जागो और बन्दूक सँम्हालों।
इस आतंकवाद के दानव
का तन तुम छलनी कर डालो।।
इन्हें शरण देने वालों के घर में
घुसकर आग लगा दो।
जिनका सर्वस्व लुटा जा रहा
उसका सोया भाग्य जगा दो।।
आचार्य ‘‘रूपेश’’ राष्ट्र दयनीय अन्र्तदशा से व्यथित अवश्य थे निराश नहीं। आपने समस्त राष्ट्रीय समस्याओं के निदान हेतु दिशा निर्देश तय किये थे।
जब अव्यवस्थाओं का अन्धकार चतुर्दिक विर्कीणक हो कर सम्पूर्ण मानवता को नैराश्य की ओर ले जा रहा है। तब आशा की किरण साहित्यकार की लेखनी से निःसृत दिखाई देती हैः-
बदल सकता है नक्शा
झोपड़ी की आत्माओं का,
अगर ये कलम वाले
ठीक से तैयार हो जायें।
झोपड़ी के नक्शे बदलने का कार्य असम्भव नहीं है। नैराश्य का तम स्थाई नहीं है। आचार्य रूपेश इन परिस्थितियों पार्थसारथी की भाँति ‘‘क्लैव्यं मा स्म गम पार्थ.’’ का मंत्र देखकर उत्साहित करते रहे।
अपने अक्षुण्ण साहित्य साधना एवं अनवरत सुगीतों की सर्जना कर हिन्दी साहित्य भण्डार की श्रीवृद्धि करने में लीन रहने वाले आचार्य रूपनारायण शुक्ल ‘‘रूपेश’’ को 21वीं शताब्दी के प्रथम वर्ष में न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त द्वारा स्ंस्थापित इटावा हिन्दी सेवा निधि की ओर से ‘बेदम वारसी-निसार सीमावी अलंकरण से अलंकृत किया गया था, इसके अलावा देशभर में सम्मान-अलंकरण प्राप्त करने वाले काव्यसाधक आचार्य रूपेश के ज्येष्ठपुत्र सिद्ध काव्यसाधक गोविन्द माधव शुक्ल हंै, उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का ‘‘गोविन्द गीता’’ नामक काव्यानुवाद किया जो सारे विश्व में अपनी आध्यात्मिक आभा से सुशोभित हो रही है। कनिष्ठ पुत्र अजय शुक्ल, ‘‘अंजाम’’ उपनाम से काव्यसृजन करते हुए साहित्य की विविध विधा पत्रकारिता, कविता, संस्मरण, गद्य, कहानी, फिल्म स्क्रिप्ट्स आदि में ख्याति अर्जित कर रहे हैं।

Оформить и получить экспресс займ на карту без отказа на любые нужды в день обращения. Взять потребительский кредит онлайн на выгодных условиях в в банке. Получить кредит наличными по паспорту, без справок и поручителей

Leave a Reply