ख्वाब उल्फ़त का – शिशिर मधुकर

सोचता खुद की तो ये रिश्ता नहीं जोड़ा होतासफ़र के बीच यूँ ही तेरा हाथ ना छोड़ा होताघरोँदा तेरा वो अगर मुझको अजीज ना होतारुख तूफां का मैंने अपनी तरफ़ ना मोड़ा होतादर्द सहने के सबक मेरे दिल के हमेशा पास रहे ख्वाब उल्फ़त का मैंने वरना ना यूँ तोड़ा होता तेरी उलझन की समझ हर वक्त मेरे दिल में थीसमर में कूदते गर जोश तेरे पास भी थोड़ा होता अपनी किस्मत से मेरे शिकवे गिले तो वाजिब हैंराहे उल्फ़त में वरना मधुकर की ना रोड़ा होताशिशिर मधुकर

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2 Comments

  1. C.M. Sharma 23/01/2019
    • Shishir "Madhukar" 23/01/2019

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