बेमतलब ज़िन्दगी

वक़्त हो चला हैअब लौटने की बारी हैबहुत उड़ लिए गगन में पतंग बन करअब कटने की बारी हैपिरो लिए बहुत मोतियाँअब टूटने की बारी हैये रौशनी बहुत तकलीफ देने लगी हैआँख वाले होने का और दिखावा नहीं किया जाताइसलिए कमरे में अंधेरा करना जरूरी हैबहुत हो गया पहेलियों को सुलझानाअब उलझनों में रहना भी जरूरी हैबहुत बांध लिए है खुद को मायाजाल मेंअब ये तिलस्म टूटना जरूरी हैबहुत बजा लिए मंदिर की घंटियाँबहुत फैला लिए चादर मक्के-मदीनाअब् उस ख़ुदा से रूठना जरूरी हैज्यादा खुलने की जरूरत नहीं हैअब सिमटना जरूरी हैबहुत जी लिए बेमतलब की ज़िन्दगीअब मतलब की मय्यत जरूरी है-अभिषेक राजहंस

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