तुम थे ही नहीं कहीं

तुम थे ही नहीं कहींसिर्फ मैं ही थातुमसे रिश्ता था मेरा पतंग जैसातुम डोर थी मेरीऔर सहारा भीतुमने जोर से खींचा था धागे कोऔर मैं गिर पड़ाअपने उम्मीदों के आसमां सेजैसे पर कतर गए होकिसी परिन्दे केतुम थे ही नहींसिर्फ मैं ही थामेरे आँखों मे पलते ख़्वाबसब टूट कर गिर पड़े और मैं भी टूट कर जमीन पर गिराकटी पतंग की तरहकिसी आवारा गली मेंबच्चे लूटने निकल पड़े थे मुझेउन्हें क्या पता थामैं तो पहले ही लुट चूका था–अभिषेक राजहंस

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  1. C.M. Sharma 17/01/2019

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