अरूण कुमार बिट्टू – शायरी

१मै निकला तेरी गली से , एक झलक पाने के लिएजो जुड़ा था रिस्ता उसे निभाने के लिएपर तू निकली बेरहम ,टूटी मेरी वहमतूने लगा दी सौ नम्बर पुलिस बुलाने के लिए२कैसी भी हो घरवाली बेकार लगती हैंदूसरे की घरवाली बड़ी खास लगती हैंगोरी हो फिर तो केहना ही क्या है यारोसावली हो वो फिर भी कोइ मुमताज लगती हैं३एक बारात निकल कर आई हैंनेता जी की अगुवाई हैंजनता को बनाया हैं आज हजूरक्योकी पाच साल जनता की ही तो खाई हैं४अच्छे दिन आ गए मोदी जी सबपे छा गएउछलने लगे सवाल फिर रौबर्ट वाड्रा के खिलाफलगता है भईया जी फिर चुनाव आ गए५निती भी अच्छी थीनीयत भी सच्ची थीफिर भी कुछ स्टेट खिसक गएलगता है राम मंदिर इनको गटक गए६ये कलम बड़ा स्वाभिमानी हैंकिसी सत्ता का गुलाम नहीजब लिखता हू सच लिखता हूफिर परिणाम की परवाह नहीं

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