चाँद – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

नज़र की बात को , जुबां पे, कभी लाओ जराचाँदनी रात हो , फिजाँ को , महकाओ जरा।छुपे हो, बादलों में क्यों तुम, हमें छोडकरदिल दे दूँ, मैं तुझको, मुझे आजमाओ जरा।तारे – सितारे, तुझको ही, सब सजाते हैंमेरे प्यार को, तुम अब ना, भरमाओ जरा।तेरी ही चाँदनी में, निखर हम, जाते हैंचाँद, तुम छुप- छुकके, अब ना शरमाओ जरा।मस्त, इन फिजाओं में ही, अब मस्त है बिन्दुछुपे हो क्यों तुम, घुँघट तो, अब हटाओ जरा।

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2 Comments

  1. Anurag 10/01/2019
  2. डी. के. निवातिया 11/01/2019

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